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एक सागर आँखों में ठहरता हुआ…

एक सागर आँखों में ठहरता हुआ,,
दिल मासूम सा मेरा बिखरता हुआ।

अवसाद आ रहा हैं यूँ निकट मेरे
पाँव पत्तों पे धीरे से धरता हुआ।

एक खौफ सा ह्रदय में पलता हुआ,
रहगुज़र पर चलता है डरता हुआ।

एक अरसे से वादाखिलाफी करे,
अपने वादों से देखो मुकरता हुआ।

उनके आने की हमें खबर जो मिली
बन ठन के मैं निकला सँवरता हुआ।

मयकशी की ये लत जिसको लगी ,
मैंने सड़कों पर देखा है मरता हुआ।

दरिया में नहाने जब वो जान लगे ,
यूँ लगा चाँद पानी में उतरता हुआ।

महेंद्र”अशआर ग़ज़ल में पिरोने लगे,
बन गया है कलाम निखरता हुआ।

महेंद्र श्रीवास्तव _

Published inग़ज़ल

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